(1) समाज का डर
मनुष्य समाज से आस-पड़ोस से डरता है। समाज के डर से कई बार अच्छे कार्य भी करता है। अपने बुरे कर्म को त्याग देता है। यह समाज का डर सुधार की दृष्टि से अच्छा है लेकिन निर्लज्ज और बेशर्म व्यक्ति पर इसका बहुत कम प्रभाव पड़ता है।
(2) अपने आपसे डरना
जो व्यक्ति अपने आप से डरता है, लज्जित होता है उसे गलत कार्य करने में पाप कर्म करने में शर्म आती हैं और वह गलत कार्य करने से पीछे हट जाता है। इस प्रकार वह अच्छे मन वाला भी हो जाता है। लेकिन लज्जित वही व्यक्ति होता है जो अपने दोषों को सदैव देखता रहता है, उनकी निगरानी करता रहता है, बार-बार आत्म निरीक्षण करता रहता है।
(3) पूर्ण पुरुषार्थ
जो व्यक्ति अपने दोषों को दूर करने में पूर्ण पुरुषार्थ करते हैं वे ही सफल होते हैं। यदि किसी व्यक्ति का सामर्थ्य अधिक है लेकिन वह अपनी सामर्थ्य से आधा या कम काम (अच्छे कर्म) कर रहा है तो उसकी आधी सामर्थ्य का व्यर्थ हो जाना ठीक बात नहीं है।
(4) ईश्वरीय न्याय:
जो व्यक्ति पूर्ण रूप से ईश्वर की न्याय व्यवस्था में विश्वास रखता है, वैदिक कर्म-फल व्यवस्था में आस्था रखता है, यम-नियम का पालन करता है, समझता है कि ईश्वर न्यायकारी है, वह पाप कर्म क्षमा नहीं करता है, ऐसा व्यक्ति अच्छे कर्म ही करता है, बुरे कर्म से बचता है। अत: यह आवश्यक है कि हम अच्छे काम करें, ताकि ईश्वर हमें सुख दे और बुरे काम न करें जिससे हमें दुःख भोगना पड़े।
(5) गलतियों का प्रायश्चित:
जो व्यक्ति अपनी गलती का प्रायश्चित करता है, उसे दोबारा न करने का संकल्प लेता है, प्रायश्चित के रूप में थोड़ा कष्ट भी भोगता है, वह बुरे कर्म करने से बच जाता है।

Social Plugin